सत्यार्थप्रकाश
सम्पादकीय
आधुनिक भारत के नव निर्माण में स्वामी दयानन्द सरस्वती का योगदान अतुलनीय है। उनका चिन्तन पुरातन ऋषियों की वैदिक परम्परा से सीधे तौर पर जुड़ा है। भारतीय जनमानस में वेदों के प्रति अटूट श्रद्धा और विश्वास रहा है। समाज के एक वर्ग ने इसी आस्था का लाभ उठाकर वेदों की मान्यता से कोसों दूर वेदों के नाम पर अनेक मत, पन्थ और ग्रन्थों की रचना कर डाली और अपने स्वार्थ की सिद्धि करने में लगा रहा। आम जनता को शिक्षा से वंचित रखा गया। शताब्दियों तक समाज का शोषण होता रहा। समाज सैंकड़ों प्रकार की कुरीतियों का शिकार हो गया। भारतीय समाज धर्म, भाषा, जाति, मत, पन्थ, ऊँच-नीच की दीवारों में बँट गया।
तात्कालिक अंग्रेज शासकों ने भारत की इस कमजोरी का भरपूर लाभ उठाया और अपने राजनैतिक हित साधने में इस कमजोरी का बखूबी इस्तेमाल किया। वेदों की व्याख्या इस रूप में करवाई गई जिससे भारत के लोग खुद अपनी ही नजरों में गिर जाएँ और आत्महीनता के शिकार होकर उनकी अधीनता से बाहर आने का विचार भी अपने मन में न ला सकें। वे अपनी भाषा, धर्म, साहित्य, संस्कृति, सभ्यता तथा अपने पूर्वज ऋषि-मुनियों - सभी से घृणा करने लगें और ईसायत की शरण में अपने आप चलें आएँ।
यह झूठ भी प्रचारित करने का कूटनीतिक प्रयास किया किया कि जो लोग भारत को अंग्रेजों से आजाद करवाना चाहते हैं वे आर्य लोग भारत के मूल निवासी नहीं हैं। स्वामी जी की दूर दृष्टि ने उनकी उस कूटनीतिक चाल को भाँप लिया और एक साथ दो मोर्चों पर अपना आन्दोलन तीव्र कर दिया। एक ओर भारतीय समाज को कुरीतियों से मुक्त करने का कार्य आरंभ किया तो दूसरी ओर वेदों की यथार्थ व्याख्या कर भारतीयों में अपने साहित्य, धर्म, संस्कृति और सभ्यता के प्रति गौरव का भाव जागृत किया जिससे अंग्रेजों की कूटनीतिक चाल बहुत सीमा तक विफल हो गई। इस आन्दोलन में स्वामी जी के अमर ग्रन्थ 'सत्यार्थप्रकाश' की बहुत बड़ी भूमिका रही। स्वामी जी ने सारे भारत में घूम-घूम कर तर्क पूर्वक बड़े ही प्रभावी ढंग से बच्चे, बूढ़े, युवा, स्त्री, पुरुष सभी में भारतीय होने का आत्मगौरव पैदा कर दिया। सबके मन में अपनी मातृभूमि भारत को बन्धन मुक्त कराने के लिए मर-मिटने का भाव तीव्र हो गया। फलतः आजादी की राह आसान हो गई।
स्वामी जी का जीवन और साहित्य राष्ट्र भक्ति से ओतप्रोत है। उन्होंने न केवल सबसे पहले 'स्वराज्य' शब्द का प्रयोग किया अपितु स्वदेशी राज्य को सर्वोत्तम बताया। उनका यह कथन पठनीय है-
"...कोई कितना ही करे परन्तु जो स्वदेशीय राज्य होता है वह सर्वोपरि उत्तम होता है। अथवा मत-मतान्तर के आग्रहरहित अपने और पराये का पक्षपातशून्य प्रजा पर पिता माता के समान कृपा, न्याय और दया के साथ विदेशियों का राज्य भी पूर्ण सुखदायक नहीं है।" (सत्यार्थप्रकाश-अष्टम समुल्लास)
'सत्यार्थ प्रकाश' स्वामी जी के विचार दर्शन को प्रकट करने वाला उनका प्रमुख ग्रन्थ है। आरंभ से ही 'सत्यार्थप्रकाश' अनेक प्रकार के विवादों और विरोधों का केन्द्र रहा। धर्म के नाम पर समाज को गुमराह करने वाले लोगों को सत्य का यह प्रकाश फूटी आँख न सुहाया। परन्तु भारत को स्वतन्त्र और समृद्ध देखने वाले भारतीय जनमानस के लिए यह कायाकल्प करने वाला अमृत सिद्ध हुआ। भारत की आजादी के आन्दोलन की रफ़्तार तेज़ हुई, सामाजिक कुरीतियों का सफाया होने लगा, स्त्रीशिक्षा को बल मिला, समाज की संकुचित सोच में बदलाव आया। नगर-नगर, गाँव-गाँव में आर्यसमाजों की स्थापना हुई। प्रायः हर-एक आर्य समाज के साथ वर्गभेद-लिंगभेद-जातिभेद से ऊपर उठकर लड़के-लड़कियों के लिए पूरे देश में गुरुकुल, स्कूल और कॉलेज खुले। प्रतिस्पर्धा में अन्य समुदायों के शुभचिन्तकों ने भी अपने स्कूल और कॉलेज खोले; और इस प्रकार पूरे भारत में बालक-बालिकाओं को सहज ही शिक्षा के सुअवसर उपलब्ध हो गए।
'आर्य शिक्षा मण्डल, जालन्धर' इसी शिक्षा आन्दोलन का एक प्रतिष्ठित स्तम्भ है। जालन्धर में 'कन्या महाविद्यालय' तथा 'दोआबा कॉलेज'-ये दो कॉलेज तथा छः स्कूल इसी के अन्तर्गत चल रहे हैं। इन सभी शिक्षण संस्थाओं में 'आर्य शिक्षा मण्डल' के माननीय प्रधान श्री चन्द्रमोहन जी के कुशल नेतृत्व एवं मार्गदर्शन में मानवीय मूल्यों पर आधारित शिक्षा प्रदान की जाती है।
कोई भी व्यक्ति स्वामी जी के विचारों से पूरी तरह या आंशिक रूप से सहमत या असहमत हो सकता है। सत्यार्थप्रकाश की भूमिका में ग्रन्थकार ने अपना अभिप्राय बड़ी विनम्रता के साथ प्रकट कर दिया है। मेरा मानना है कि ग्रन्थकार का अभिप्राय समझकर तटस्थ भाव से यदि कोई स्वामी जी के ग्रन्थों को पढ़ता है तो उसे निराशा नहीं होगी। स्वामी जी का विचार दर्शन आज भी समाज को नयी दिशा और ऊर्जा देने में सहायक है, इसका अधिक से अधिक प्रचार-प्रसार युवकों में सामाजिक नवचेतना और समरसता के लिए आवश्यक है।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया / इन्टरनेट विचारों को बहु-उपयोगी तथा विश्व-व्यापी बनाने में सबसे सस्ता तथा सबसे अधिक समर्थ साधन है। इन्टरनेट पर स्वामी जी का प्रायः सारा साहित्य स्कैन करके पीडीएफ फाईलों के रूप में निःशुल्क डाउनलोड के लिए उपलब्ध है परन्तु यूनिकोड प्रारूप में एक भी पुस्तक उपलब्ध नहीं है। स्कैन की गई पुस्तकें पढ़ने के लिए तो ठीक हैं परन्तु सर्चेबल न होने से शोध करने वाले छात्रों के लिए बहु-उपयोगी नहीं होती। इस कठिनाई को दूर करने के लिए स्वामी जी के सम्पूर्ण साहित्य को यूनिकोड प्रारूप में इन्टरनेट पर उपलब्ध कराने की आवश्यकता है।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, भारत सरकार की ओर से दोआबा कॉलेज, जालन्धर में इसी वर्ष 'स्वामी दयानन्द स्टडीज़ सैंटर' की स्थापना हुई है। इसी के अधीन यूनिकोड फॉन्ट में सत्यार्थप्रकाश का यह डिजिटल रूप कॉलेज की वैबसाइट पर निःशुल्क डाउनलोड के लिए उपलब्ध कराया जा रहा है। निःसन्देह स्वामी दयानन्द के साहित्य पर शोध करने वाले छात्रों के साथ-साथ उनके विचार दर्शन का अध्ययन करने वाले पाठकों के लिए भी यह एक अनुपम भेंट होगी।
इस डिजिटल संस्करण को पूरी तरह से शुद्ध तथा प्रामाणिक बनाने का प्रयास किया गया है फिर भी यदि कहीं कोई भूल रह गई हो तो पाठक कृपया ईमेल पर हमें सूचित करें, उसे ठीक कर दिया जाएगा।
सत्यार्थ प्रकाश का एण्ड्रायड एप संस्करण भी तैयार हो चुका है। सत्यार्थ प्रकाश को इस रूप में उपलब्ध कराने के लिए दोआबा कालेज के कम्प्युटर साइंस एण्ड आई.टी. विभाग की सेवाएं ली गई हैं। प्राध्यापक श्री गुरमीत सिंह इसके लिए विशेष रूप से बधाई के पात्र हैं।
देवनागरी लिपि के साथ-साथ रोमन लिपि [International Alphabet of Sanskrit Transliteration-IAST] एवं असमिया, बाङ्ला, गुजराती, गुरमुखी आदि लिपियों में भी सत्यार्थप्रकाश के लिप्यन्तरित [Transliterated] डिजिटल संस्करण तथा इन भाषाओं में सत्यार्थप्रकाश के उपलब्ध अनुवादों को यूनिकोड प्रारूप में इन्टरनेट पर उपलब्ध कराने की भी योजना है। सत्यार्थ प्रकाश के हिन्दी संस्करण के साथ साथ अंग्रेजी अनुवाद का सर्चेबल डीजिटल प्रारूप भी तैयार हो चुका है।
-डॉ॰ नरेश कुमार धीमान
प्राचार्य, दोआबा कॉलेज, जालन्धर
एवं
निदेशक, स्वामी दयानन्द स्टडीज़ सैंटर , जालन्धर
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